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कौन सी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी मिर्गी को कवर करती है?

India +91

भारत में मिर्गी के रोगियों के लिए स्वास्थ्य बीमा

 

एपिलेप्सी केवल एक चिकित्सीय नहीं, बल्कि बीमा से जुड़ी चुनौती भी है। ये एक दिमागी बीमारी है जिसमें लोगों को अक्सर दौरे पड़ते हैं। आम भाषा में हम इसे मिर्गी कहते हैं। ये दौरे कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनट तक हो सकते हैं। इस दौरान व्यक्ति का शरीर झटके मारता है, उसे कुछ होश नहीं होता और कई बार तो उसका दिमाग ब्लैंक हो जाता है। क्या ऐसी बीमारी का बीमा उपलब्ध है? आइए जानते हैं।

 

मिर्गी और इंश्योरेंस

 

2018 में IRDAI ने एक वर्किंग ग्रुप बनाया था जिसका काम था ये तय करना कि बीमा में कौन-कौन सी बीमारियाँ शामिल होंगी और कौन सी नहीं। वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट में 17 बीमारियों की लिस्ट बनाई गई। उनके मुताबिक अगर ये बीमारियाँ किसी व्यक्ति को पॉलिसी लेने के बाद हो तो इन्हें कवर किया जाना चाहिए और पॉलिसी लेने से पहले से हो तो ये स्थायी रूप से बाहर रखी जा सकती है मतलब स्थायी अपवर्जन। इस लिस्ट में मिर्गी, अल्जाइमर, पार्किंसन, HIV, जैसी बीमारियाँ शामिल थी।

 

इसके बाद 2019 में IRDAI और मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 के निर्देश दिए की बीमा कंपनियों को मानसिक बीमारियों का इलाज शारीरिक बीमारियों के इलाज की तरह ही कवर करना होगा। साथ ही मानसिक बीमारी और जेनेटिक डिसऑर्डर को कवरेज से हटाया नहीं जा सकता।  इसके बावजूद, कई बीमा कंपनी ये लागू नहीं कर पाई।

 

इसके बाद भी मिर्गी को कवर करने का नियम नहीं बदला। IRDAI के 2020 के मास्टर सर्कुलर में मिर्गी फिर से बाहर मतलब एक्सक्लूशन में शामिल थी। इसके खिलाफ “संवेदना फाउंडेशन” ने सुप्रीम कोर्ट में केस किया। उनका कहना था की IRDAI का नियम अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है। ये मिर्गी के मरीज़ों के साथ भेदभाव है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, और 21 का उल्लंघन करता है. यह नागरिकों को मूलभूत अधिकार प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार सुनिश्चित करता है

 

इस पर IRDAI ने सुप्रीम कोर्ट ये जवाब दिया है की मिर्गी को बाहर रखना जोखिम नियंत्रण की दृष्टि से ज़रूरी है।

 

क्यों मिर्गी ज्यादातर पॉलिसियों में सीधे कवर नहीं होती?

 

कई लोग सोचते हैं कि मिर्गी को कवर क्यों नहीं किया जाता। इसके पीछे मेडिकल और इंश्योरेंस दोनों कारण होते हैं, जैसे-

 

क्रॉनिक / लंबी चलने वाली बीमारी

 

ये एक लंबी चलने वाली बीमारी है। इसमें इलाज काफ़ी लंबे समय तक चलता है, नियमित दवाइयाँ लेनी होती है। ऐसे में कंपनी को लंबे समय तक लगातार दावे की राशि का भुगतान करना होगा जिससे कंपनी बचना चाहती है।

 

बार-बार दौरे पड़ना

 

मिर्गी का 100% इलाज नहीं है। इसमें अचानक दौरे पड़ते है। अगर गलती से दवाई की खुराक छूट हो जाए या किसी तरह का मानसिक तनाव हो तो फिर अस्पताल में भर्ती होना पड़ सकता है। ऐसे में ये बीमारी कंपनी के लिए भी बड़ा खतरा बन सकती है।

 

धोखाधड़ी का खतरा

 

कई लोग वेटिंग पीरियड या क्लेम के खारिज होने से बचने के लिए अपनी बीमारी को छुपाते है। ऐसे में अगर लोगों ने सीधा क्लेम करना शुरू किया तो कंपनी को बार-बार बड़े दावों का भुगतान करना पड़ेगा।

 

मिर्गी के लिए पॉलिसी में क्या देखें?

 

पॉलिसी लेने के बाद मिर्गी का पता चलने पर क्लेम संभव है। भले ही यह बीमारियों की सूची में न हो या कोई विशेष पॉलिसी न हो, फिर भी यह कुछ परिस्थितियों में कवर हो सकती है।

 

  • जैसा की अब आप जान चुके हैंकी मिर्गी एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है। इसलिए जब भी आप पॉलिसी खरीदें तो उसमें न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर कवर हैं या नहीं ये ज़रूर जाँचें। इससे मिर्गी का इलाज उसी कवरेज में शामिल हो जाएगा।
  • 30- 40% मामलों में मिर्गी के पीछे जेनेटिक मतलब अनुवांशिक कारण भी हो सकते हैं। तो आपको ऐसी पॉलिसी पर ध्यान देना चाहिए जिसमें जेनेटिक डिसऑर्डर भी कवर होते हैं।
  • मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 और IRDAI निर्देशों के तहत फिजिकल व मेंटल हेल्थ को समान माना जाता है। मिर्गी खुद मेंटल डिसऑर्डर नहीं है, लेकिन इससे जुड़ी मानसिक समस्याएं (जैसे डिप्रेशन, बाइपोलर डिसऑर्डर) होने पर मेंटल कवर के तहत क्लेम किया जा सकता है।
  • आपकी पॉलिसी में आउट पेशेंट इलाज या दवाओं का खर्च कवर होना चाहिए क्योंकि मिर्गी एक लंबी चलने वाली बीमारी है।

 

निष्कर्ष

 

मिर्गी जैसी गंभीर बीमारियों का खर्च अक्सर एक परिवार के लिए बहुत भारी होता है। अगर आपके परिवार में किसी को भी एक बीमारी हो चुकी है तो आपको अपना चेकअप ज़रूर कर लेना चाहिए ताकि ज़रूरत पड़ने पर वेटिंग पीरियड की वजह से इलाज में देरी ना हो। विचारपूर्वक अपने लिए उपयुक्त बीमा योजना चुनें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मिर्गी के लिए फिलहाल कोई खास पॉलिसी नहीं है लेकिन चूंकि ये एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, आप इसके लिए अप्रत्यक्ष रूप से कवरेज प्राप्त कर सकते हैं।

यह पॉलिसी की शर्तों पर निर्भर है। शर्तें पूरी हों और अस्पताल में भर्ती जरूरी हो, तो कंपनी खर्च दे सकती है, लेकिन हर पॉलिसी अलग होती है, इसलिए नियमों को ध्यान से पढ़ें।

  • अगर ये बीमारी पहले से है तो इसकी जानकारी कंपनी को होनी चाहिए।
  • IRDAI के अनुसार ज़्यादा से ज़्यादा 3 साल का वेटिंग पीरियड होता है।

आपकी पॉलिसी में जनेटिक, न्यूरोलॉजिकल या मेंटल डिसॉर्डर कवर होना चाहि

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