इंश्योरेंस पॉलिसी में कवर होने वाली गंभीर बीमारियों की सूची

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क्रिटिकल इलनेस (गंभीर बीमारियां): अर्थ, निदान और बीमारियों की सूची

 

"स्वास्थ्य का महत्व तब समझ में आता है, जब बीमारी आ जाती है।" यह कहावत बताती है कि हम अक्सर अपने स्वास्थ्य की अहमियत तब समझते हैं, जब हमें किसी बीमारी का सामना करना पड़ता है। सामान्य बीमारी हो या क्रिटिकल इलनेस (गंभीर बीमारी), यह अचानक हो सकती है। इसलिए, समय रहते इसकी जानकारी होना और बचाव के लिए जरूरी कदम उठाना बेहद महत्वपूर्ण है। आइए, इस लेख में क्रिटिकल इलनेस क्या है और गंभीर बीमारियों की सूची के बारे में विस्तार से जानते हैं।

 

क्रिटिकल इलनेस क्या है?

 

क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस एक ऐसी बीमा योजना है, जो पॉलिसीधारक को पॉलिसी में कवर की गई किसी गंभीर बीमारी का निदान होने पर वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इससे इलाज और रिकवरी के दौरान होने वाले खर्चों का प्रबंधन करने में मदद मिलती है।

 

क्रिटिकल इलनेस ऐसी गंभीर और संभावित रूप से जानलेवा स्वास्थ्य स्थिति होती है, जिसके लिए लंबे समय तक इलाज और रिकवरी की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसी बीमारियां व्यक्ति के जीवन पर शारीरिक और आर्थिक, दोनों तरह से गहरा प्रभाव डाल सकती हैं। कैंसर, किडनी फेलियर (गुर्दे की विफलता), हार्ट अटैक, स्ट्रोक और पैरालिसिस गंभीर बीमारियों के कुछ सामान्य उदाहरण हैं।

 

क्रिटिकल इलनेस (गंभीर बीमारियों) की सूची

 

आपकी चुनी गई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी के अनुसार कई क्रिटिकल इलनेस (गंभीर बीमारियां) कवर की जा सकती हैं। नीचे ऐसी कुछ प्रमुख गंभीर बीमारियों की सूची दी गई है:

 

1. किडनी फेलियर (गुर्दे की विफलता): किडनी फेलियर, जिसे रीनल फेलियर भी कहा जाता है, एक ऐसी स्थिति है जिसमें किडनी खून से अपशिष्ट (वेस्ट) पदार्थों को पर्याप्त मात्रा में फ़िल्टर करने की अपनी क्षमता खो देती है।

2. स्ट्रोक: स्ट्रोक तब होता है, जब मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह रुक जाता है या कम हो जाता है। इससे उस हिस्से को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं मिल पाते, जिसके कारण मस्तिष्क की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं।

3. कोमा: कोमा एक ऐसी अवस्था है, जिसमें व्यक्ति लंबे समय तक बेहोश रहता है, अपने आसपास की चीज़ों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता और उसे होश में नहीं लाया जा सकता। यह एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें तुरंत चिकित्सा सहायता की जरूरत होती है। कोमा होने के संभावित कारणों में स्ट्रोक, सिर में गंभीर चोट और दवाओं की अधिक मात्रा (ओवरडोज़) शामिल है।

4. अंधापन: अंधापन ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति को आंशिक या पूरी तरह से दिखाई देना बंद हो जाता है। कुछ लोगों को कम दिखाई देता है, जबकि कुछ लोगों को बिल्कुल भी दिखाई नहीं देता और वे प्रकाश का भी एहसास नहीं कर पाते।

5. कैंसर: कैंसर कई बीमारियों का एक समूह है, जिसमें शरीर की कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं और शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकती हैं। यह दुनिया भर में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। कैंसर के कई प्रकार होते हैं, जो शरीर के अलग-अलग अंगों को प्रभावित कर सकते हैं।

6. अंग विफलता: ऑर्गन फेलियर तब होता है, जब शरीर का कोई महत्वपूर्ण अंग, जैसे हार्ट, लिवर, किडनी या फेफड़े, सही ढंग से काम करना बंद कर देते हैं। यह समस्या अचानक भी हो सकती है या समय के साथ धीरे-धीरे (क्रॉनिक) विकसित हो सकती है। इसके पीछे अक्सर चोट, किसी बीमारी या अंग तक पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति न होना जैसे कारण होते हैं।

7. मल्टीपल स्क्लेरोसिस: यह एक क्रॉनिक बीमारी है, जो कई मामलों में व्यक्ति को अक्षम बना सकती है। यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र, खासकर मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी, पर हमला करती है।

8. पैरालिसिस: लकवा (पैरालिसिस) एक ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर के किसी हिस्से या पूरे शरीर की मांसपेशियां काम करना बंद कर देती हैं, जिससे व्यक्ति उस हिस्से को हिला-डुला नहीं पाता। यह समस्या अस्थायी या स्थायी हो सकती है और शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है।

9. अल्ज़ाइमर: अल्ज़ाइमर डिजीज़ धीरे-धीरे बढ़ने वाला एक मस्तिष्क संबंधी विकार है, जो याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित करता है। यह डिमेंशिया का सबसे आम प्रकार है और डिमेंशिया के लगभग 60–70% मामलों में यही बीमारी पाई जाती है।

10. हार्ट अटैक

हार्ट अटैक एक गंभीर चिकित्सकीय आपातस्थिति है, जो तब होती है जब हृदय तक रक्त का प्रवाह अचानक रुक जाता है। ऐसा आमतौर पर खून के थक्के (ब्लड क्लॉट्स) के कारण होता है। हार्ट अटैक की स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता और इलाज की आवश्यकता होती है।

11. पार्किंसन: यह धीरे-धीरे बढ़ने वाली तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारी है, जो मुख्य रूप से चलने-फिरने और शरीर की गतिविधियों को प्रभावित करती है। यह बीमारी मस्तिष्क की उन तंत्रिका कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने के कारण होती है, जो डोपामिन बनाती हैं। डोपामिन शरीर की गतिविधियों को संतुलित और नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

12. पल्मोनरी हाइपरटेंशन: यह ऐसी स्थिति है, जिसमें फेफड़ों की धमनियों में रक्तचाप बढ़ जाता है। इससे हृदय को फेफड़ों तक रक्त पंप करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है, जो आगे चलकर हार्ट फेलियर का कारण बन सकता है।

13. ब्रेन ट्यूमर: एक ऐसी स्थिति है, जिसमें मस्तिष्क में असामान्य कोशिकाओं का एक समूह (गांठ) बन जाता है। इसमें कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने और विभाजित होने लगती हैं। ब्रेन ट्यूमर गैर-कैंसरयुक्त या कैंसरयुक्त हो सकता है। गैर-कैंसरयुक्त ट्यूमर आमतौर पर शरीर के अन्य हिस्सों में नहीं फैलता, जबकि कैंसरयुक्त ट्यूमर आसपास के ऊतकों या शरीर के अन्य अंगों तक फैल सकता है।

14. थर्ड-डिग्री बर्न: थर्ड-डिग्री बर्न जलने की सबसे गंभीर स्थितियों में से एक है, जिसमें त्वचा की सभी परतें प्रभावित हो जाती हैं। कई मामलों में, त्वचा के नीचे मौजूद फैट और मांसपेशियां भी क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। प्रभावित हिस्सा काला, भूरा या सफेद दिखाई दे सकता है और त्वचा चमड़े जैसी सख्त हो सकती थर्ड-डिग्री बर्न नसों को भी नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि आसपास के हिस्सों में तेज दर्द महसूस हो सकता है।

15. क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD): यह फेफड़ों की एक धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है, जिसके कारण सांस लेने में परेशानी होने लगती है। इसमें एम्फिसीमा और क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस जैसी स्थितियां शामिल होती हैं। इन बीमारियों में फेफड़ों की वायु नलिकाएं और वायु थैलियां क्षतिग्रस्त होकर सूज जाती हैं, जिससे फेफड़ों में हवा का आना-जाना प्रभावित हो जाता है।

16. मोटर न्यूरॉन डिजीज़ (MND): दुर्लभ तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारियों का एक समूह है, जो मोटर न्यूरॉन्स को प्रभावित करता है। ये तंत्रिका कोशिकाएं चलने-फिरने, हाथ-पैर हिलाने और अन्य शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं। इस बीमारी में मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं, और समय के साथ यह कमजोरी बढ़ने लगती है।

17. स्थायी या पूर्ण बहरापन: ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति पूरी तरह या लगभग पूरी तरह सुनने की क्षमता खो देता है। इस स्थिति में हियरिंग एड या अन्य ध्वनि बढ़ाने वाले उपकरणों का उपयोग करने पर भी व्यक्ति आवाज़ नहीं सुन पाता।

18. अप्लास्टिक एनीमिया: यह एक दुर्लभ लेकिन गंभीर बीमारी है, जिसमें अस्थि मज्जा (बोन मैरो) पर्याप्त नई रक्त कोशिकाएं नहीं बना पाती। इसके कारण थकान, संक्रमण का खतरा बढ़ना और अधिक रक्तस्राव जैसी समस्याएं हो सकती हैं। यह बीमारी आनुवंशिक कारणों, ऑटोइम्यून रोगों, या कुछ टॉक्सिक सब्स्टांसेस, दवाओं और वायरस के संपर्क में आने के कारण हो सकती है।

19. बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस: यह एक गंभीर और जानलेवा संक्रमण है, जो मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को ढकने वाली सुरक्षात्मक झिल्लियों (मेनिन्जीस) में बैक्टीरिया के इन्फेक्शन के कारण होता है। यह संक्रमण तब हो सकता है, जब बैक्टीरिया रक्त के माध्यम से या सीधे इन झिल्लियों तक पहुंच जाते हैं। इसके सामान्य लक्षणों में गर्दन में अकड़न, तेज सिरदर्द, बुखार और तेज रोशनी से परेशानी शामिल हैं। इसके अलावा खासकर शिशुओं में उल्टी, त्वचा पर चकत्ते, अत्यधिक सुस्ती जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।

20. एन्सेफलाइटिस: यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें मस्तिष्क में सूजन आ जाती है। यह आमतौर पर वायरल संक्रमण के कारण होती है, जबकि कुछ दुर्लभ मामलों में ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया भी इसका कारण बन सकती है। इसके संभावित लक्षणों में सिरदर्द, भ्रम (कन्फ्यूजन), दौरे पड़ना, बुखार और गर्दन में अकड़न शामिल हैं।

21. मस्कुलर डिस्ट्रॉफी: यह आनुवंशिक बीमारियों का एक समूह है, जिसमें मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं और क्षतिग्रस्त होती जाती हैं। इसके 30 से अधिक प्रकार हैं। इनमें बीमारी शुरू होने की उम्र, प्रभावित मांसपेशियां, गंभीरता और बीमारी के बढ़ने की गति अलग-अलग हो सकती है। यह बीमारी आनुवंशिक बदलावों के कारण होती है, जो मांसपेशियों के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी प्रोटीन को प्रभावित करते हैं।

22. सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस: इसे ल्यूपस भी कहा जाता है, यह एक क्रॉनिक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर ही हमला करने लगती है, जिससे त्वचा, जोड़ों, हृदय, फेफड़ों, किडनी और मस्तिष्क सहित शरीर के कई अंगों में सूजन हो सकती इसके लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं और कम या अधिक गंभीर हो सकते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों में थकान, जोड़ों में दर्द, बुखार और चेहरे पर तितली के आकार का चकत्ता शामिल हैं। हालांकि, इस बीमारी का सटीक कारण अभी तक पूरी तरह से ज्ञात नहीं है।

23. सिर की गंभीर चोट: इसे ट्रॉमैटिक ब्रेन इंजरी भी कहा जाता है। यह मस्तिष्क पर बाहरी चोट लगने से होने वाली गंभीर स्थिति है, जिसके लिए तुरंत इलाज जरूरी होता है। इसके प्रमुख लक्षणों में नाक या कान से खून या पारदर्शी तरल पदार्थ निकलना शामिल है। इसके अलावा, व्यक्ति में बेहोशी, तेज सिरदर्द, भ्रम की स्थिति, अस्पष्ट बोलना, बार-बार उल्टी होना और शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन या कमजोरी जैसे लक्षण भी हो सकते हैं।

24. लिवर सिरोसिस: लिवर सिरोसिस एक ऐसी गंभीर बीमारी है, जिसमें लंबे समय तक हुई क्षति के कारण लिवर स्थायी रूप से खराब हो जाता है। इससे लिवर की सामान्य रूप से काम करने की क्षमता प्रभावित होती है और समय के साथ लिवर फेलियर का खतरा बढ़ जाता है। इसके सामान्य लक्षणों में पीलिया, शरीर में सूजन आदि शामिल है। हालांकि, लिवर को हुई क्षति को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन उचित इलाज से इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। यह बीमारी क्रॉनिक हेपेटाइटिस (जैसे हेपेटाइटिस B या C), लंबे समय तक शराब के अत्यधिक सेवन या नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) के कारण हो सकती है।

25. कार्डियोमायोपैथी: हृदय की मांसपेशियों की एक बीमारी है, जिसमें वे बड़ी, मोटी, कठोर या कमजोर हो जाती हैं। इससे हृदय की पूरे शरीर में रक्त को प्रभावी ढंग से पंप करने की क्षमता प्रभावित होती है।

26. सीवियर रुमेटॉइड आर्थराइटिस: एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें जोड़ों में तेज दर्द, सूजन और अकड़न होती है। समय के साथ यह हड्डियों और उपास्थि (कार्टिलेज) को नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे जोड़ों का आकार बिगड़ सकता है और वे ठीक से काम नहीं कर पाते। यह बीमारी फेफड़ों, हृदय, आंखों और त्वचा जैसे शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकती है।

27. टर्मिनल इलनेस: ऐसी गंभीर और लाइलाज बीमारी है, जिसमें इलाज के बावजूद व्यक्ति के जीवित रहने की संभावना बहुत कम होती है। ऐसी स्थिति में इलाज का मुख्य उद्देश्य बीमारी को ठीक करना नहीं, बल्कि लक्षणों को नियंत्रित करना और रोगी को बेहतर देखभाल व आराम प्रदान करना होता है।

28. क्रॉनिक लंग डिजीज़: क्रॉनिक लंग डिजीज़ लंबे समय तक रहने वाली श्वसन संबंधी बीमारियों का एक समूह है। इसमें सीओपीडी और अस्थमा जैसी बीमारियां शामिल हैं, जो वायु मार्ग या फेफड़ों के ऊतकों को प्रभावित करके सांस लेने में कठिनाई पैदा करती हैं। यह बीमारी धूम्रपान, वायु प्रदूषण और काम के दौरान हानिकारक पदार्थों के संपर्क में आने के कारण हो सकती है। हालांकि इसका पूरी तरह इलाज संभव नहीं है, लेकिन दवाओं, पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन, ऑक्सीजन थेरेपी और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इसके लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

29. फुलमिनेंट वायरल हेपेटाइटिस: एक दुर्लभ लेकिन जानलेवा बीमारी है, जिसमें अचानक हुए गंभीर वायरल संक्रमण के कारण लिवर तेजी से काम करना बंद करने लगता है। इससे लिवर की कई कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं और उसकी कार्यक्षमता तेजी से कम हो जाती है। इसके कारण मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है (हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी) और एक्यूट लिवर फेलियर जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।

30. न्यूमोनेक्टॉमी: न्यूमोनेक्टॉमी एक बड़ी सर्जरी है, जिसमें पूरे फेफड़े को निकाल दिया जाता है। यह सर्जरी आमतौर पर फेफड़ों के गंभीर कैंसर, मेसोथेलियोमा या अन्य कारणों से गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त फेफड़े के इलाज के लिए की जाती है। सर्जरी से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि बचा हुआ फेफड़ा शरीर की जरूरतों के अनुसार पर्याप्त रूप से कार्य करने में सक्षम हो।

31. सीवियर क्रोहन डिजीज़: इसमें लक्षण अत्यधिक गंभीर हो सकते हैं, जिससे फिस्टुला या फोड़ा और आंतों में ब्लॉकेज जैसी जटिलताएं विकसित हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में गहन चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता होती है और कुछ मामलों में सर्जरी भी करनी पड़ सकती है।

32. ओपन हार्ट सर्जरी द्वारा हृदय वाल्व को ठीक करना या प्रत्यारोपित करना: यह एक सर्जरी है, जिसमें खराब हृदय वाल्व को ठीक किया जाता है। इसके लिए वाल्व के छिद्रों को बंद किया जाता है, जुड़ी हुई वाल्व लीफलेट्स को अलग किया जाता है या उसके चारों ओर की रिंग को मजबूत किया जाता है। यदि ऐसा संभव न हो, तो वाल्व को बदलकर नया कृत्रिम वाल्व लगाया जाता है।

33. बोलने की क्षमता का खत्म हो जाना: यह कई तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याओं के कारण हो सकता है। इनमें एफ़ेसिया शामिल है, जिसमें मस्तिष्क को नुकसान पहुंचने के कारण व्यक्ति को बोलने या भाषा समझने में कठिनाई होती है। वहीं डिसआर्थ्रिया (Dysarthria) में बोलने वाली मांसपेशियों को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। यह समस्या स्ट्रोक, सिर की गंभीर चोट या मस्तिष्क में ट्यूमर के कारण हो सकती है।

34. सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस विद ल्यूपस नेफ्राइटिस: सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस विद ल्यूपस नेफ्राइटिस ल्यूपस का एक गंभीर रूप है। ल्यूपस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अपने ही स्वस्थ ऊतकों और अंगों पर हमला करती है। इस स्थिति में किडनी भी प्रभावित होती है और उसे नुकसान पहुंच सकता है।

35. अपैलिक सिंड्रोम : अभी इसे अनरेस्पॉन्सिव वेकफुलनेस सिंड्रोम (UWS) भी कहा जाता है, ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति की आंखें खुली हो सकती हैं और वह जागा हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसे अपने आसपास की कोई समझ या जागरूकता नहीं होती। इसमें मस्तिष्क का सेरेब्रल कॉर्टेक्स गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाता है, जबकि ब्रेनस्टेम सामान्य रूप से काम करता रहता है।

36. क्रॉयट्सफेल्ट-जैकब डिजीज़ (CJD): एक दुर्लभ, जानलेवा और तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारी है। यह बीमारी प्रायन (Prion) नामक एक असामान्य प्रोटीन से जुड़ी होती है। इसके कारण तेजी से डिमेंशिया (याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता में कमी), शरीर के संतुलन और समन्वय में समस्या तथा अन्य तंत्रिका संबंधी लक्षण विकसित हो सकते हैं।

37. मोटर न्यूरॉन रोग के स्थायी लक्षण: मोटर न्यूरॉन रोग (MND) में मोटर न्यूरॉन्स धीरे-धीरे और स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त होने लगते हैं। इसके कारण मांसपेशियां कमजोर होकर धीरे-धीरे सिकुड़ने लगती हैं, साथ ही बोलने, निगलने और सांस लेने में कठिनाई तथा लगातार थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं। समय के साथ यह बीमारी लकवा (Paralysis) और स्थायी विकलांगता का कारण भी बन सकती है।

अगर आपके मन में यह सवाल है कि गंभीर बीमारियों (Critical Illnesses) का इलाज किस तरह के बीमा में कवर होता है, तो आमतौर पर इसके लिए क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस या हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी के साथ मिलने वाला क्रिटिकल इलनेस ऐड-ऑन कवर उपलब्ध होता है। हालांकि, इसका कवरेज बीमाकर्ता और पॉलिसी की शर्तों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

 

क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस (Critical Illness Insurance): इस पॉलिसी के तहत कवर की जाने वाली गंभीर बीमारियों की सूची हर बीमा कंपनी में अलग हो सकती है। आमतौर पर बीमाकर्ता कुछ निर्धारित गंभीर बीमारियों को कवर करता है। यदि पॉलिसीधारक को पॉलिसी में शामिल किसी गंभीर बीमारी का निदान पॉलिसी की शर्तों के अनुसार होता है, तो उसे बीमा राशि का भुगतान किया जाता है।

 

क्रिटिकल इलनेस इतनी गंभीर क्यों मानी जाती हैं?

 

क्रिटिकल इलनेस इसलिए गंभीर मानी जाती हैं क्योंकि ये स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकती हैं, इनके इलाज के लिए गहन चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता पड़ती है और कई मामलों में ये लंबे समय तक रहने वाली विकलांगता या मृत्यु का कारण भी बन सकती हैं। इन बीमारियों से शरीर के महत्वपूर्ण अंगों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। समय पर इलाज न मिलने पर जीवन के लिए खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा, ये व्यक्ति को शारीरिक रूप से कमजोर बना सकती हैं, जिसके कारण लंबे समय तक देखभाल की आवश्यकता पड़ती है और उसका दैनिक जीवन भी प्रभावित हो सकता है।

 

चूंकि इन बीमारियों के इलाज में लंबा समय लग सकता है और महंगा हो सकता है, इसलिए हेल्थ इंश्योरेंस या क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस चुनने से पहले लोग अक्सर यह जानना चाहते हैं कि क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस किन बीमारियों को कवर करता है, क्योंकि कवर की जाने वाली बीमारियां हर बीमा कंपनी और पॉलिसी की शर्तों के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।

 

गंभीर बीमारियों का इलाज

 

गंभीर बीमारियों के उपचार का मुख्य उद्देश्य प्रभावित अंगों की कार्यक्षमता को बनाए रखना और उनसे जुड़े जोखिमों को कम करना होता है। इसके लिए मरीज की बीमारी और उसकी समग्र स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार दवाओं, चिकित्सा उपकरणों की सहायता और सर्जरी जैसी विभिन्न उपचार विधियों का उपयोग किया जाता है। सामान्य तौर पर गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए निम्नलिखित उपचार किए जा सकते हैं:

 

  • मैकेनिकल वेंटिलेशन: श्वसन विफलता की स्थिति में वेंटिलेटर फेफड़ों तक हवा पहुंचाकर मरीज को सांस लेने में सहायता करता है।
  • दवाएं: विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए अलग-अलग दवाओं का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, संक्रमण के इलाज के लिए एंटीबायोटिक्स, रक्त के थक्कों के लिए ब्लड थिनर्स और अंगों की कार्यक्षमता बेहतर बनाए रखने के लिए अन्य दवाएं दी जाती हैं।
  • हीमोडायनामिक मॉनिटरिंग और सपोर्ट: इसमें रक्तचाप, रक्त संचार और अन्य महत्वपूर्ण संकेतों की नियमित निगरानी की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर उचित चिकित्सकीय हस्तक्षेप के माध्यम से रक्तचाप और रक्त संचार को सामान्य बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।
  • पोषण संबंधी सहायता: जब मरीज खुद से खाना खाने में सक्षम नहीं होता, तो उसे आवश्यक पोषण देने के लिए नसों के माध्यम से पोषण या फीडिंग ट्यूब की मदद ली जाती है।
  • घावों की देखभाल: चोट, सर्जरी के घाव या दबाव के कारण होने वाले घाव के इलाज और देखभाल के लिए विशेष चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है।
  • संक्रमण नियंत्रण: संक्रमण से बचाव और उसका इलाज करने के लिए स्वच्छता संबंधी नियमों का सख्ती से पालन किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर संक्रमणरोधी दवाओं का भी उपयोग किया जाता है।
  • दर्द का प्रबंधन: मरीज को आराम पहुंचाने और जल्दी स्वस्थ होने में दर्द से राहत देना बहुत महत्वपूर्ण होता है।
  • पुनर्वास: फिजिकल थेरेपी और ऑक्यूपेशनल थेरेपी मरीज को अपनी ताकत, शारीरिक क्षमता और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता वापस पाने में मदद करती हैं।
  • अंगों की कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए उपचार और प्रत्यारोपण: यदि किसी अंग की कार्यक्षमता प्रभावित हो जाए या वह काम करना बंद कर दे, तो किडनी फेल होने पर डायलिसिस या अंग प्रत्यारोपण जैसे उपचारों की आवश्यकता पड़ सकती है।
  • मनोवैज्ञानिक सहायता: गंभीर बीमारी के मानसिक प्रभावों से निपटने के लिए मरीज और उसके परिवार को मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करना भी महत्वपूर्ण होता है।
  • सीएबीजी: सीएबीजी (कोरोनरी आर्टरी बायपास ग्राफ्टिंग) एक सर्जरी है, जिसका उपयोग कोरोनरी आर्टरी डिजीज के इलाज के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में हृदय की संकरी या बंद धमनियों के स्थान पर शरीर के किसी अन्य हिस्से से ली गई स्वस्थ रक्त वाहिका जोड़कर रक्त के प्रवाह के लिए नया रास्ता बनाया जाता है। इससे हृदय की मांसपेशियों तक रक्त का प्रवाह बेहतर होता है, सीने के दर्द (एंजाइना) जैसे लक्षणों से राहत मिलती है और हार्ट अटैक का खतरा भी कम हो सकता है।
  • महाधमनी की सर्जरी: महाधमनी की सर्जरी में महाधमनी, जो शरीर की सबसे बड़ी धमनी होती है, उससे जुड़ी बीमारियों के इलाज के लिए की जाने वाली विभिन्न सर्जिकल प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। इस सर्जरी में महाधमनी के क्षतिग्रस्त हिस्से को ठीक करना या बदलना शामिल हो सकता है। इसकी आवश्यकता आमतौर पर एन्यूरिज़्म (धमनी का कमजोर होकर फूल जाना) या डिसेक्शन (धमनी की दीवार में दरार पड़ना) जैसी स्थितियों में पड़ती है।
  • हृदय वाल्व की सर्जरी: हृदय वाल्व सर्जरी ऐसी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से बीमारी या क्षति के कारण ठीक से काम न कर रहे हृदय वाल्व को ठीक किया जाता है या बदला जाता है। इसमें मौजूदा वाल्व को ठीक करना या उसकी जगह नया कृत्रिम वाल्व लगाना शामिल हो सकता है।

 

गंभीर बीमारियों के इलाज के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

 

गंभीर बीमारियों के इलाज के दौरान कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। इनमें शामिल हैं:

 

  1. समय पर इलाज: समय पर इलाज और क्रिटिकल केयर यूनिट में उचित देखभाल मिलने से मरीज के जल्दी स्वस्थ होने और बेहतर परिणाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
  2. मरीज के अनुसार इलाज: हर मरीज की स्वास्थ्य स्थिति और मेडिकल हिस्ट्री अलग होती है। इसलिए उपचार की योजना उसकी जरूरतों और स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है।
  3. विशेषज्ञों की टीम द्वारा इलाज: गंभीर बीमारियों के प्रभावी इलाज के लिए अक्सर विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों की टीम मिलकर काम करती है। इसमें डॉक्टर, नर्स, रेस्पिरेटरी थेरेपिस्ट और अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं।
  4. लगातार निगरानी और इलाज में बदलाव: क्रिटिकल केयर में भर्ती मरीजों की लगातार निगरानी की जाती है। उनकी स्वास्थ्य स्थिति में होने वाले बदलावों के अनुसार इलाज की योजना में समय-समय पर आवश्यक बदलाव किए जाते हैं।

 

गंभीर बीमारियों की पहचान के लिए कौन-कौन से टेस्ट्स किए जाते हैं?

 

गंभीर बीमारियों की पहचान के लिए कई प्रकार के जांच परीक्षण किए जाते हैं। ये परीक्षण बीमारी का पता लगाने, उसकी गंभीरता का आकलन करने और सही उपचार तय करने में मदद करते हैं।

 

1. लैब टेस्ट्स

 

  • रक्त जांच: ब्लड टेस्ट के माध्यम से कम्प्लीट ब्लड काउंट, इलेक्ट्रोलाइट्स, कार्डियक मार्कर्स, रक्त शर्करा का स्तर और रक्त के थक्के बनने की क्षमता जैसी महत्वपूर्ण चीजों की जांच की जाती है।
  • यूरिन टेस्ट: पेशाब की जांच से संक्रमण या किडनी से जुड़ी समस्याओं का पता लगाया जाता है।
  • आर्टेरियल ब्लड गैस जांच: यह जांच रक्त में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर को मापती है, जिससे फेफड़ों और श्वसन प्रणाली के कार्य का आकलन करने में मदद मिलती है।
  • माइक्रोबायोलॉजी कल्चर: रक्त, मूत्र या स्पुटम जैसे नमूनों की जांच करके संक्रमण फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों की पहचान की जाती है।
  • बायोमार्कर जांच: इस जांच में विशिष्ट बायोमार्कर्स की जांच की जाती है, जिससे अंगों की कार्यक्षमता या बीमारी की स्थिति का आकलन किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, ट्रोपोनिन की जांच हृदय की मांसपेशियों को हुए नुकसान का पता लगाने में मदद करती है।

 

2. इमेजिंग टेस्ट्स

 

  • एक्स-रे: यह जांच हड्डियों और कुछ नरम ऊतकों की तस्वीरें उपलब्ध कराती है। इसकी मदद से फ्रैक्चर, फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं और अन्य चिकित्सकीय स्थितियों का पता लगाया जा सकता है।
  • सीटी स्कैन: सीटी स्कैन शरीर के भीतरी हिस्सों की विस्तृत क्रॉस-सेक्शनल तस्वीरें प्रदान करता है। इससे अंगों, रक्त वाहिकाओं और नरम ऊतकों की स्पष्ट जांच करने में मदद मिलती है।
  •  एमआरआई: इस जांच में मैग्नेटिक फील्ड और रेडियो तरंगों की मदद से कोमल ऊतकों की विस्तृत तस्वीरें तैयार की जाती हैं। यह मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और मांसपेशियों व हड्डियों से जुड़ी चोटों का आकलन करने में उपयोगी है।
  • अल्ट्रासाउंड: इस जांच में ध्वनि तरंगों का उपयोग करके शरीर के आंतरिक अंगों और रक्त वाहिकाओं की तस्वीरें बनाई जाती हैं। इससे पेट या पेट के निचले हिस्से, हृदय और रक्त प्रवाह का आकलन करने में मदद मिलती है।
  •  पीईटी स्कैन (Positron Emission Tomography): पीईटी स्कैन शरीर में कोशिकाओं की चयापचय गतिविधि को दिखाता है। इससे कैंसर के चरण, उसके शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने (Metastasis) तथा अन्य बीमारियों का पता लगाने और उनका आकलन करने में मदद मिलती है।

 

3. अन्य जांच प्रक्रियाएं

 

  • बायोप्सी: इस प्रक्रिया में ऊतक का एक छोटा नमूना लेकर उसकी माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है। इससे कैंसर सहित कई अन्य बीमारियों का पता लगाने में मदद मिलती है।
  • एंडोस्कोपी: इस जांच में कैमरे लगी एक पतली और लचीली नली की मदद से शरीर के अंदरूनी अंगों, जैसे भोजन नली, पेट और कोलन की जांच की जाती है।
  • इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम: यह जांच हृदय की विद्युत गतिविधि को रिकॉर्ड करती है, जिससे हृदय से जुड़ी समस्याओं का पता लगाने में मदद मिलती है।
  • इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राम (EEG): यह जांच मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को रिकॉर्ड करती है, जिससे दौरे और अन्य तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याओं का पता लगाने में मदद मिलती है।
  • विस्कोइलास्टिक जांच: यह जांच रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया का तेजी से आकलन करती है। इससे गंभीर रूप से बीमार मरीजों में रक्त चढ़ाने की आवश्यकता और उचित उपचार तय करने में मदद मिलती है।
  • पॉइंट-ऑफ-केयर अल्ट्रासाउंड: इस जांच की मदद से मरीज के बिस्तर के पास ही विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का तेजी से आकलन किया जा सकता है।

 

गंभीर बीमारियों से बचाव

 

कुछ स्वस्थ आदतें अपनाकर गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है। गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए नीचे दिए गए सामान्य उपाय अपनाए जा सकते हैं:

 

  1. धूम्रपान छोड़ें: धूम्रपान न करना या धूम्रपान छोड़ देना हृदय रोग, टाइप 2 डायबिटीज, कैंसर, फेफड़ों की बीमारियों और समय से पहले मृत्यु के खतरे को कम करने में मदद करता है। लंबे समय से धूम्रपान करने वाले लोगों को भी धूम्रपान छोड़ने से स्वास्थ्य लाभ मिल सकता है।
  2. स्वस्थ आहार लें: स्वस्थ और संतुलित भोजन हृदय रोग, टाइप 2 डायबिटीज और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों से बचाव करने, उनके जोखिम को कम करने और उन्हें नियंत्रित रखने में मदद करता है। एक संतुलित आहार में फल, सब्जियां, कम वसा वाला प्रोटीन, साबुत अनाज और कम वसा वाले डेयरी उत्पाद शामिल होने चाहिए। साथ ही, अतिरिक्त चीनी, संतृप्त वसा और नमक का सेवन कम करना चाहिए।
  3. नियमित व्यायाम और शारीरिक गतिविधियां: नियमित व्यायाम और शारीरिक गतिविधियां कई दीर्घकालिक बीमारियों से बचाव करने, उनके खतरे को कम करने और उन्हें नियंत्रित रखने में मदद करती हैं। इसलिए, हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट तक तेज चाल से चलने या बागवानी जैसी मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधियां करने का प्रयास करें। साथ ही, सप्ताह में कम से कम 2 दिन मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाले व्यायाम भी करें।
  4. शराब का सेवन सीमित करें: लंबे समय तक या अधिक मात्रा में शराब का सेवन करने से उच्च रक्तचाप, कई प्रकार के कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और लिवर की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। शराब का सीमित मात्रा में सेवन करने या इससे बचने से इन स्वास्थ्य जोखिमों को कम किया जा सकता है।
  5. नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं: क्रॉनिक बीमारियों से बचाव या उनका समय रहते पता लगाने के लिए डॉक्टर और डेंटिस्ट से नियमित जांच कराएं। आवश्यकता अनुसार कैंसर की स्क्रीनिंग, प्रीडायबिटीज और डायबिटीज की जांच भी कराते रहें।
  6. दांतों की देखभाल करें: कैविटी, मसूड़ों की बीमारी और मुंह का कैंसर जैसी समस्याएं दर्द और कई तरह की परेशानियों का कारण बन सकती हैं। इनसे बचाव के लिए फ्लोराइड युक्त पानी पिएं, दिन में दो बार फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट से ब्रश करें और रोजाना डेंटल फ्लॉस का इस्तेमाल करें। साथ ही, हर साल कम से कम एक बार डेंटिस्ट से दांतों की जांच जरूर कराएं, भले ही आपके प्राकृतिक दांत न हों या आप डेंचर (नकली दांत) का इस्तेमाल करते हों।
  7. पर्याप्त नींद लें: पर्याप्त नींद न लेने से डायबिटीज, मोटापा, हृदय रोग और अवसाद होने का खतरा बढ़ सकता है। साथ ही, इन बीमारियों को नियंत्रित करना भी मुश्किल हो सकता है। वयस्कों को रोजाना कम से कम 7 घंटे की नींद लेनी चाहिए।
  8. अपने परिवार के स्वास्थ्य इतिहास के बारे में जानें: यदि आपके परिवार के किसी सदस्य को डायबिटीज, कैंसर, हृदय रोग या ऑस्टियोपोरोसिस जैसी क्रॉनिक बीमारी रही है, तो आपके लिए भी उसका जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए, अपने परिवार के स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी डॉक्टर को जरूर बताएं, ताकि वे आपको इन बीमारियों से बचाव और समय पर जांच के बारे में सही सलाह दे सकें।

 

गंभीर बीमारी से ठीक होने में लगने वाले समय को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं?

 

गंभीर बीमारी से उबरने की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद पूरी तरह स्वस्थ होने में कुछ सप्ताह से लेकर कई वर्षों तक का समय लग सकता है। जहां कुछ लोग जल्द ही अपनी नॉर्मल लाइफ जीने लगते हैं, वहीं कई लोगों को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कई महीनों या वर्षों तक करना पड़ सकता है। ठीक होने में लगने वाले समय को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं:

 

  1. बीमारी की गंभीरता: बीमारी की शुरुआती गंभीरता और इंटेंसिव केयर यूनिट में बिताया गया समय, दोनों ही ठीक होने में लगने वाले समय को काफी हद तक प्रभावित करते हैं।
  2. व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति: गंभीर बीमारी होने से पहले की स्वास्थ्य स्थिति, पहले से मौजूद अन्य बीमारियां तथा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी इस बात को प्रभावित करते हैं कि व्यक्ति कितनी जल्दी और कितनी अच्छी तरह स्वस्थ हो पाता है।
  3. आयु: नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) के अनुसार, बढ़ती उम्र के साथ गंभीर बीमारी के बाद सामान्य कार्यक्षमता दोबारा हासिल करने में अधिक समय लग सकता है।
  4. गंभीर बीमारी का प्रकार: कुछ गंभीर बीमारियां ऐसी होती हैं, जिनके प्रभाव लंबे समय तक बने रह सकते हैं और ठीक होने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
  5. मनोवैज्ञानिक कारक: गंभीर बीमारी के बाद चिंता, अवसाद और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसी मानसिक समस्याएं होना आम बात है। ये समस्याएं भी रिकवरी को प्रभावित कर सकती हैं।

 

महत्वपूर्ण सूचना: यह जानकारी केवल जागरूकता के उद्देश्य से साझा की गई है। इसे चिकित्सीय सलाह का विकल्प न समझें। यदि आपको कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या या एलर्जी है, तो अपनी डाइट में कोई भी बदलाव करने से पहले डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

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